कार्ड तो है, लेकिन सेहत स्मार्ट नहीं

मोतियाबिंद के मरीज लक्ष्मण भगत का जब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्मार्ट कार्ड बना तो, उसे आशा बंधी कि पैसा हो या न हो मेरी आंखें जरूर ठीक हो जायेंगी। लेकिन जब वह इलाज के लिए शहर पहुंचा और लोगों से यह जानने का प्रयास किया कि आखिर इसके माध्यम से इलाज कैसे होगा? तो उसे काफी मायूसी हुई क्योंकि किसी को भी यह मालूम नहीं था कि स्मार्ट कार्ड से कैसे और किस अस्पताल में इलाज हो सकता है। सही उश्रर नहीं मिलने के कारण लक्ष्मण अस्पताल का चक्कर लगाते रहे, लेकिन उनका ईलाज नहीं हुआ। अंत में पैसे देकर ईलाज कराया। लक्ष्मण भगत लीची का षहर कहे जाने वाले बिहार के मुज़फ्फरपुर जिला स्थित पारू ब्लॉक के जलीलनगर गांव के रहने वाले हैं। इसी गांव के रामवरण, रामसागर और इंद्रदेव भगत तथा उसके जैसे कई लोगों के पास भी ऐसा ही कार्ड है, लेकिन इसका उपयोग कैसे करें यह किसी को पता नहीं है। घर में कोई बीमार हुआ तो झोलाछाप डॉक्टरों की षरण में जाने की मजबूरी है। इसी ब्लॉक के चांदकेवारी पंचायत की कांति देवी (कार्ड संख्या 1000693216), चंदा देवी (1000693278), हिमांचली देवी (100963297), को भी स्मार्ट कार्ड के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। ये सवाल करती हैं कि इस कार्ड से कहां और किस अस्पताल में इलाज होगा? आखिर कितने लोगों का इलाज होगा? आदि। एक कार्डधारी ने कहा कि एक बार के बाद दुबारा ईलाज नहीं होता है क्योंकि पूरे के पूरे पैसे अस्पताल प्रषासन रख लेता है। साहेबगंज ब्लॉक के मुसहर बस्ती के सैकड़ों गरीबों के पास स्मार्ट कार्ड तो बना हुआ है, लेकिन उसके बारे में विषेश कुछ भी पता नहीं हैं। वास्तव में स्मार्ट कार्ड, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना केंद्र की एक महत्वाकांक्षी योजना है। जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे गरीबों को स्वास्थ्य सुविधा बेहतर स्वरूप में प्रदान करना है। इसके तहत उन्हें एक स्मार्ट कार्ड आवंटित किया जाता है। लेकिन मुज़फ्फरपुर की तरह बिहार के कई जिलों में यही कार्ड महज दिखावा साबित हो रहा है। इससे कार्डधारियों का इलाज तो दूर, उल्टे उन्हें परेषानी और जिल्लत झेलनी पड़ती है। लाभार्थियों को जानकारी के अभाव में अस्पतालों की खाक छाननी पड़ रही है। डॉक्टर और अस्पताल प्रषासन इस पचड़े में पड़ना नहीं चाह रहे हैं, क्योंकि सरकार समय पर पैसे का भुगतान नहीं करती है। कई बार इसका फायदा दलाल उठाते हैं और गरीबों को लूटते हैं जबकि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए थी। इसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता का अभाव है। सरकार ने इस योजना को जमीन पर तो उतार दिया लेकिन इससे क्या और कैसा फायदा हो सकता है, यह बताने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। परिणामस्वरूप जिस योजना को जमीन पर कामयाबी मिलनी चाहिए थी, जिस योजना के कारण देश में स्वास्थ्य का स्तर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेहतर होता वही योजना अब दिखावा बन कर रह गया है।

केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के तहत सभी बीपीएल परिवारों को एक वर्श तक निशुल्क इलाज उपलब्ध करवाना है। एक कार्ड में पांच सदस्यों का इलाज संभव हो सकता है। इसके तहत सरकार इंश्योरेंस कंपनी से प्रत्येक बीपीएल परिवार का एक साल के लिए बीमा करवाती है। बीमित राषि 30 हजार रुपये की होती है, जिसमें पूरे परिवार का स्वास्थ्य जांच, ऑपरेषन, दवा, ईलाज, भोजन, आने-जाने के खर्च संलग्न हैं। इस कार्ड के तहत षहर के चिन्हित सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है। राश्ट्रीय स्वास्थ बीमा योजना को देष के 445 जिलों में लागू किया गया है। देष में अब तक 34,818,761 परिवार स्मार्ट कार्ड का लाभ उठा रहे हैं। जिनमें बिहार में मई के पहले सप्ताह तक 70,83,107 परिवारों तक यह कार्ड पहुंच चुका है। जबकि 1,36,44464 परिवारों को स्मार्ट कार्ड के दायरे में लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मुज़फ्फरपुर जिले में स्मार्ट कार्ड के तहत 6,82,358 परिवारों को षामिल किया जाना है। जिसमें 08 मई तक 4,07,715 परिवारों को इस सुविधा से जोड़ दिया गया है। लेकिन मुज़फ्फरपुर में इंष्योरेंस कंपनी की गलत नीति के कारण षहर के प्रसिध्द नर्सिंग होम या डॉक्टर स्मार्ट कार्ड पर गरीबाें का इलाज करने से कन्नी काटने लगे हैं। कागजी खानापूर्ति और कंपनी की पेमेंट पॉलिसी के कारण सरकारी अस्पताल के डॉक्टर भी स्मार्ट कार्ड पर ईलाज करने से परहेज करते हैं। गरीबों की सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है। मुज़फ्फरपुर जिले में स्मार्ट कार्ड पर कार्डधारियों का इलाज कराना मुश्किल होता जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वास्थ बीमा योजना कहने को जनता के लिए एक बड़ी सौगात है। अब तक करीब 2 करोड़ से भी अधिक लाभार्थियों को फायदा पहुंचा है। इस कार्ड को बहुउदद्ेश्ीय बनाने के लिए सरकार अन्य योजनाओं को इससे जोड़ने का प्रयास कर रही है। दरअसल आरएसबीवाई कार्ड इलैट्रानिक है। इसके चिप में काफ ी स्पेस है जिसका पूरा लाभ उठाया जा सकता है। इस स्मार्ट कार्ड में 32 केबी का डाटा संग्रहित किया जा सकता है। जिसे 120 केबी तक बढ़ाया जा सकता है। इसमें 17 केबी राष्ट्रीय स्वास्थ बीमा योजना के तहत सूचनाएं दर्ज करवाने के लिए काफ ी हैं। ऐसे में बचे हुए स्पेस का अन्य योजनाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है। स्मार्ट कार्ड का दायरा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों तक ही सीमित है। ऐसे में सरकार सब्सिडी के लिए जरूरतमंद लोगों को जो अनाज मुहैया कराती है, उसे भी इस कार्ड के माध्यम से खरीदा जा सकेगा। इस दिषा में ओडिशा ने पहल भी कर ली है जहां स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से गेहूं और चावल भी खरीदा जा सकता है। जाहिर है ओडिशा के इस कदम का अन्य रायों को भी पहल करनी चाहिए। प्रश्न उठता है कि एक तरफ  हम कार्ड को और भी अधिक स्मार्ट बनाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर यही कार्ड यदि आम आदमी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रहा है तो सरकार को इस ओर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि केवल कार्ड बन जाने से ही सेहत स्मार्ट नहीं हो जाता है।