आधुनिक हिंदी साहित्य और रंगमंच के जनक
भारतेंदु हरिश्चन्द्र ( 1850 - 1885 ) ने ' रसा ' उपनाम से कई खूबसूरत और
यादगार ग़ज़लें लिखी थीं। प्रस्तुत हैं भारतेंदु की दो ग़ज़लें !
एक
आ गई सर पर कज़ा लो सारा सामां रह गया
ऐ फ़लक क्या क्या हमारे दिल में अरमां रह गया
बागबां है चार दिन की बाग़े आलम में बहार
फूल सब मुरझा गए ख़ाली बियाबां रह गया
इतना एहसां और कर लिल्लाह ऐ दस्ते जनूं
बाकी गर्दन में फकत तारे गिरेबां रह गया
याद आई जब तुम्हारे रूप रौशन की चमक
मैं सरासर सूरते आईना हैरां रह गया
ले चले दो फूल भी इस बाग़े आलम से न हम
वक़्त रेहलत हैफ है ख़ाली ही दामां रह गया
मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम
हौसला सब दिल का दिल में ही मेरी जां रह गया
नातवानी ने दिखाया ज़ोर अपना ऐ ' रसा '
सूरते नक्शे क़दम मैं बस नुमायां रह गया
दो
बैठे जो शाम से तेरे दर पर सहर हुई
अफ़सोस ऐ कमर कि न मुतलक ख़बर हुई
अरमाने वस्ल यों ही रहा सो गए नसीब
जब आंख खुल गई तो यकायक सहर हुई
दिल आशिकों के छिल गए तिरछी निगाह से
मिज़गां की नोक दुश्मने जानी जिगर हुई
पछताता हूं कि आंख अबस तुम से लड़ गई
बरछी हमारे हक में तुम्हारी नज़र हुई
छानी कहां न खाक़, न पाया कहीं तुम्हे
मिट्टी मेरी ख़राब अबस दर-ब-दर हुई
ध्यान आ गया जो शाम को उस जुल्फ़ का ' रसा '
उलझन में सारी रात हमारी बसर हुई
आधुनिक हिंदी साहित्य और रंगमंच के जनक भारतेंदु हरिश्चन्द्र ( 1850 - 1885 ) ने ' रसा ' उपनाम से कई खूबसूरत और यादगार ग़ज़लें लिखी थीं। प्रस्तुत हैं भारतेंदु की दो ग़ज़लें !
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