| कृषि रोडमैप से नहीं सुलझ रही किसानों की दशा | |||||
अमृतांज इंदीवर गांव का विकास किये बिना देश का विकास संभव नहीं है। अनाज, साग-सब्जी, दूध, तेलहन, दलहन, मसाले आदि का उत्पादन गांव में होता है, परंतु उसका दाम बाजार तय करता है। कृषि योजना का ढ़ांचा वातानुकूलित कमरों में बैठकर उन लोगों द्वारा तैयार किया जाता है जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह अनजान होते हैं। बिहार में किसी भी बाहरी एजेंसी से यदि कृषि योजनाओं की जमीनी सच्चाई की जांच कराई जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा। खेतीहर किसानों को एड़ी-चोटी एक करनी पड़ती है इसके बावजूद कृषि योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। जबकि भारत कृषि प्रधान देश है और अस्सी प्रतिशत लोगों की आजीविका कृषि पर आधारित है। विकसित भारत और शाइनिंग बिहार कैसे बनाया जा सकता? जब कृशि संबंधी योजना भी कमीशन के बगैर पूरा नहीं होता है। बिहार के तमाम जिलों में अनुदान के नाम पर किसानों से ठगी की जा रही है। दूसरी ओर बड़ी बड़ी मशीनों के माध्यम से खेती करने वालों को किसान की संज्ञा देकर उन्हें राय स्तर पर सम्मानित किया जा रहा है जबकि वास्तव में किसान का कार्य कर राय के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वालों को नजरअंदाज किया जाता है। प्रखंड से लेकर गांव तक कृषि के प्रशिक्षण की जगह रजिस्टरों में खानापूर्ति की जा रही है। असल बात तो यह है कि उपर से लेकर नीचे तक सभी किसी न किसी रूप में घपले और घोटालों में उलझे हुए हैं। जो ईमानदार हैं उन्हें काम करने से रोका जाता है। सरकार का कृषि रोड मैप इंफेक्टेड हो गया है। गौर करने वाली बात है कि किसानों को कर्ज के लिए, केसीसी लोन के लिए बैंक का चक्कर लगाना पड़ रहा हो, बिना घूस के खेतीबारी करने के लिए पैसे नहीं मिलते हो तो बिहार की तस्वीर कैसे बदलेगी। अब किसान साहूकार से कर्ज लेकर खेती करना मुनासिब समझने लगे हैं। बैंक के आंकड़ों की तरफ झांककर तहकीकात की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि किसानों को केसीसी या अन्य कृषि आधारित उद्योग लगाने के लिए कितने घूस देने पड़ रहे हैं । पूरा सिस्टम बीमारू होता जा रहा है। कर्मचारी आम आदमी के फायदे के लिए योजनाएं बनाने की जगह कमीषन वसूली की योजना बनाने लगे हैं। बिहार के मुजफ्फ रपुर स्थित सकरा प्रखंड के अयोध्या प्रसाद, मछही किसान क्लब सुजावलपुर बैंक से केसीसी लेने के लिए दौड़ते रहे, लेकिन हर बार उन्हें मायूसी हाथ लगी। आखिरकार मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गुहार लगानी पड़ी। कितने किसान होंगे जो सरकार के दरबार में जाने का हौसला रखेंगे। उत्तर बिहार में डेयरी विकास योजना का भी बुरा हाल है। बागवानी मिशन का भी यही हाल है। पौधशाला, बागवानी, बागवानी की देखभाल, वर्मी कम्पोस्ट एवं प्रशिक्षण के लिए ढेर सारी योजनाएं हैं परंतु दलाल इंफेक्शन के कारण असली किसानों को लाभ नहीं मिल रहा। गांव में दिए जाने वाला प्रशिक्षण कागज पर पूरा हो रहा है। प्रशिक्षण में असली किसानों की संख्या नगण्य रहती है। मिठाई-समोसे के साथ दस लोग बैठकर पच्चास लोगों की हाजिरी बना देते हैं। आज भी असली किसान से पूछा जाये कि सरकार का कृषि रोडमैप क्या है तो उतर नकारात्मक में ही मिलेगा। कृषि मेला में छोटे यंत्र पर सब्सिडी का लाभ तो पर्याप्त मिल जाता है परंतु पंपसेट के नाम पर अनुदान हड़पने का खेल प्रखंड से लेकर जिला कृषि विभाग और चुनिंदा दुकानदारों तक होता है। राय सरकार बजट में कृषि पर अधिक से अधिक जोर देने की बात कहती है। केंद्र की ओर से प्रस्तुत बजट में भी बिहार जैसे पिछड़े राय को ध्यान में रखते हुए पैसों का आंवटन किया जाता है। लेकिन इसके बाद भी उम्मीद से कम विकास का कुछ और ही कहानी बयां करता है। जिस ओर ध्यान देना सबसे ज्यादा जरूरी है। बेहतर यह होगा कि वक्त रहते चिंता के इस लकीर को मिटा दिया जाए। |

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