भारत कृषि प्रधान देश है . गाँधी जी ने कहा है की भारत की आत्मा गाँव में बस्ती है .गाँव के अर्थ का आधार खेती, पशुपालन, कृषि पर आधारित उद्योग व हस्त निर्मित वस्तु की बिक्री पर पूरा का पूरा जीवन टिका हुआ है. पर, फटेहाल, विवश व  साधनहीन . यही तो रोना है. आजादी के बन से सरकारी स्तर पर ढेर सारी योजनाए बनी हरित क्रांति  से लेकर सफ़ेद क्रांति तक अपितु सारे योजनाए सरकारी कागजो में अधिक जमीन पर कम . यही तो कारण है की भारतीया किसान खेती मे नुकसान होने या सरकारी बैंक के ऋण नहीं चुकता होने पर आत्महत्या तक कर रहे हैं . आखिर कबतक यह चलता रहेगा . आने  वाले दिन मे बहुराष्ट्री कंपनियों के हाथों कृषि बिक जाएगी भारतीय किसान मज़बूरी मे अपनी जमीन कंपनियों के हाथों देकर खुद कंपनी मे बतौर नौकरी करेंगे . पूरा का पूरा किसानी बहिरष्ट्रिये कंपनियों के हाथ होगा. उल्लेखनीय है की जहा खेती करने मे किसानों को कर्ज आज भी गाँव के साहूकारों से लेना परता हो, बैंक ऋण केवल संपन वक्तिवो को मिलता हो तो आम किसान क्या करेंगे....आत्महत्या करेंगे या अन्यत्र जमीन गिरवी रख नौकरी करेंगे.  दूसरी तरफ सरकारी विभाग केवल समर्थन मूल्य  निर्धारण करने में आगे रहते हैं. बात तो वही हुई जोते कोई काटे कोई यानि खाद, बीज, पानी काफी दाम देकर खरीदें और बेचे समर्थन मूल्य मे सरकार की सारी योजना एसी कमरे में बन रही है तो सौभायिक है की किसान के हित में कोई योजना हो ही नहीं सकती. हालत तो एसी है की कभी बाढ़ तो कभी सुखार की मर सहते सहते किसान की  कमर टूट चुकी है. दूसरी तरफ सरकार ने कृषि रोड माप का नक्शा खीच कर खामाखा किसानों का परेशान करने की निति अपनाई जा रही है. किस किसान के पास फुर्सत है की प्रखंड का चक्कर लगये. बीज और खाद की कालाबाजारी किसी से छुपी नहीं है . चारो तरफ किसानों से पैसा लुटने के होड़ मे बीज-खाद कम्पनियो के इस खेल मे सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं . एसे में भला किसानों का दर्द ख़त्म होगा. बिलकुल नहीं योजना आयोग गाव की पगडंडी पर आकर ग्राम विकास की योजना बनये तो संभव है की कुछ हालात सुधरेगी .